*आज यानी 18 मार्च को पेरिस कम्यून की 150वीं बरसी है। इसी दिन 18 मार्च 1871 में पेरिस के मजदूरों की सशस्त्र क्रांति के बाद सर्वहारा के जनतांत्रिक शासन, पेरिस कम्यून की स्थापना से दुनिया भर की पूंजीवादी ताकतें सकते में आ गयी थी*

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*आज यानी 18 मार्च को पेरिस कम्यून की 150वीं बरसी है। इसी दिन 18 मार्च 1871 में पेरिस के मजदूरों की सशस्त्र क्रांति के बाद सर्वहारा के जनतांत्रिक शासन, पेरिस कम्यून की स्थापना से दुनिया भर की पूंजीवादी ताकतें सकते में आ गयी थी*

मजदूरों ने 1871 में 72 दिन तक (18 मार्च से 28 मई) पेरिस में शासन किया था। यह पूरे दुनिया की पहली मजदूरों की समाजवादी सरकार थी। इससे पहले समाजवादी शासन सिर्फ यूटोपिया यानी कल्पनालोक था। यह घटनाक्रम प्रशिया (आधुनिक जर्मनी) के साथ युद्ध में फ्रांस की पराजय और नेपोलियन (तृतीय) के द्वितीय साम्राज्य के पतन के बाद घटित हुआ। फरवरी 1871 में निर्वाचित फ्रांस की नेशनल एसेंबली (जिसमें रॉयलिस्टों का वर्चस्व था) वर्साय (एक प्रांत) में प्रशिया के साथ एक संधि करने जा रही थी, जिससे पेरिस के रिपब्लिकनों को लगा कि वहां एक बार फिर राजशाही की स्थापना हो सकती है, लिहाजा मजदूरों ने 18 मार्च को विद्रोह करते हुए शासन व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। आनन-फानन में लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों तथा मजदूर नेताओं की बैठक हुई। आमचुनावों के लिए 26 मार्च, 1871 का दिन तय कर दिया गया। नगरीय निकाय के चुनाव में भी इन मजदूरों को बढ़त हासिल हुई, जिससे वहां कम्यून सरकार का गठन हुआ। यह औद्योगिक क्रांति के दौरान श्रमिक वर्ग द्वारा स्थापित पहली सरकार थी, स्थानीय प्रशासन को व्यवस्थित रूप देते हुए 92 सदस्यीय कम्यून-परिषद का गठन किया गया। उसमें बड़ी संख्या प्रशिक्षित कामगारों और मजदूर नेताओं की थी। उनके अलावा परिषद में डाॅक्टर, पत्रकार, नर्स, अधिवक्ता, अध्यापक जैसे पेशेवर, राजनीतिक कार्यकर्ता, सुधारवादी नेता, छोटे उद्यमी, उदार धर्मपंथी तथा समाजवादी नेता भी सम्मिलित थे। जर्मन सम्राट की सेना और उसके सभी सैनिक अवसर देखकर पेरिस छोड़कर भाग गए थे। नगर पूरी तरह से विद्रोही नागरिक सेना के अधिकार में था।

बोनापार्ट के कुशासन और उसके सैनिकों के अनाचार तथा बैंकरों, कारखानेदारों और व्यापारियों की लूट से जनता का आक्रोश चरम पर था। समाजवादी इंटरनेशनल के कार्यक्रम और प्रचार मजदूर असंतोष को दिशा दे रहे थे। बोनापार्ट युद्ध का माहौल बना रहा था और समाजवादी इंटरनेशनल के नेता और कार्यकर्ता युद्धोन्माद के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहे थे। फ्रांस की गरिमा के तथा शत्रु प्रशिया से अपनी जमीन वापस लेने के नाम पर जब 15 जुलाई 1870 को बोनापार्ट ने युद्ध की घोषणा की तो इसकी चारों तरफ निंदा हुई। समाजवादी इंटरनेशनल की फ्रांसीसी इकाई ने सभी देशों के कामगारों के नाम 12 जुलाई को घोषणापत्र जारी किया और उस घोषणा पत्र का अंश- “राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए, राष्टीय सम्मान के यूरोपीय संतुलन के नाम पर एक बार फिर दुनिया के अमन-चैन पर खतरे घने बादल मंडराने लगे हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन के कामगर साथियों! आइए हम एकजुट होकर युद्ध के विरुद्ध आवाज बुलंद करें।….. यह युद्ध वर्चस्व या सल्तनत का युद्ध है। कामगारों की टृष्टि से यह एक आपराधिक बेहूदगी है।….।”

कई शहरों में मजदूरों ने शांति मार्च आयोजित किया। समाजवादी इंटरनेशनल की जर्मन इकाई के कार्यकर्ताओं ने भी युद्ध का विरोध किया। नतीजतन जब प्रशिया और फ्रांस की सेनाएं आमने-सामने थीं तब वहां के मजदूर एक दूसरे को शांति-संदेश भेज रहे थे। युद्ध और युद्ध विरोधी अभियानों की विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। 2 सितंबर 1870 को देश की पूर्वी सीमा, सेडान में बोनापार्ट की सेना की पराजय के बाद बिस्मार्क की सेना ने सम्राट को उनके 100,000 सैनिकों के साथ बंदी बना लिया। पेरिस की सड़कों पर नारे लगाते, नाचते-गाते कामगारों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। यह जनसैलाब राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना की मांग कर रहा था।

फ्रांस और प्रशिया (जर्मनी) के युद्ध में फ्रांस की पराजय से वहां के आम नागरिकों के बीच जहां शासकवर्ग के प्रति आक्रोश की लहर थी। ऊपर से युद्ध के बाद बेरोजगारी और महंगाई की मार से जनजीवन तंगहाल था। घोर अराजकता का वातावरण था। अव्यवस्था के वातावरण में लोगों का तत्कालीन शासकों से भरोसा ही उठ चुका था। बिना किसी तैयारी के युद्ध की घोषणा कर देना, सिर्फ एक राजसी सनक थी, जिसके कारण सम्राट को अंततः पराजय का मुंह देखना पड़ा। सितंबर आते-आते पेरिस का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। युद्ध के कारण अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी चौड़ी हो चुकी थी। सूदखोर व्यापारी युद्ध की स्थितियों का लाभ उठाकर मनमाने तरीके से लूट मचा रहे थे। प्रशासन के स्तर पर पूरी तरह अराजक स्थिति थी। जनसाधारण की कोई सुनने वाला न था। ऊपर से प्रूशिया की सेनाओं द्वारा बमबारी और फ्रांसिसी सैन्यबलों की नाकामी से श्रमिक-असंतोष विद्रोह ही स्थिति तक जा पहुंचा था। कुछ नेशनल गार्ड का भत्ता रोक दिया गया और उन्हें काम में क्षमता प्रमाणित करने को कह गया। शहर के घेरे से बहुत लोग बेरोजगार हो गए थे। भुखमरी तो नहीं भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए थे। सभी को बकाया किराया और कर्ज 48 घंटे में जमा करने का फरमान जारी हो गया, जिससे छोटे-मोटे व्यापारियों पर दिवालियापन का खतरा मड़राने लगा। फ्रांस की राजधानी पेरिस से वर्साय स्थांतरित कर दी गयी। और ऐसे ही अन्य जनविरोधी नीतियों ने गरीबों को दरिद्र बना दिया लेकिन इन्हीं के प्रतिक्रियास्वरूप मध्यवर्ग की सामाजिक चेतना का जनवादीकरण हुआ। थियर की प्रतिक्रियावादी सरकार को उखाड़ फेंकना ही पेरिस की मुक्ति का रास्ता था।

युद्ध अक्सर, खासकर, पराजय की स्थिति में, क्रांतिकारी परिस्थितियां पैदा करता है। युद्ध से लोगों की रोजमर्रा की दिनचर्या तहस-नहस हो जाती है। सरकार के कर्त्ता-धर्ताओं, परजीवी राज्य मशीनरी, सेना, मीडिया तथा सत्ता के अन्य स्तंभों के क्रियाकलापों के परीक्षण में लोगों की निगाहों का पैनापन कई गुना बढ़ जाता है। संसद में बहुमत पूंजीवादी गणतंत्रवादियों और बोनापार्टवादियों यानि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों का था। लोगों ने कुछ दिन राष्ट्रीय एकता के नाम पर सरकार का समर्थन किया लेकिन धीरे-धीरे असंतोष फिर फैलने लगा। सेना में उच्च अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार, सैनिकों के कमजोर मनोबल तथा हताशा के कारण फ्रांस का पतन हुआ। पराजित फ्रांसिसी सम्राट को जर्मनी के सम्राट के आगे, उसकी शर्तों पर युद्धविराम के लिए विवश होना पड़ा। इससे तुरंत बाद जर्मन सैनिकों ने नगर में विजेता के घमंड के साथ प्रवेश किया। पेरिसवासियों के मन में प्रशिया साम्राज्य के प्रति बेहद नाराजगी थी। लोग भीतर ही भीतर सुलग रहे थे। स्थानीय नागरिकों ने मिलकर एक राष्ट्रीय सुरक्षादल का गठन किया, उसने सदस्यों में अधिकांश मजदूर और कारखानों में काम करने वाले औधोगिक मजदूर थे। नागरिक सेना का नेतृत्व प्रगतिशील समाजवादी नेताओं के अधीन था। नागरिक सेना के प्रति जनसाधारण के समर्थन और विश्वास का अनुमान मात्र इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयंसेवी सैनिकों की संख्या रात-दिन बढ़ रही थी। स्त्री, बच्चे और बूढ़े जो लड़ाई में सीधे हिस्सा लेेने में असमर्थ थे, वे भी अपने अनुकूल काम खोज रहे थे, ताकि अवसर पड़ने पर दुश्मन से लड़ सकें और राष्ट्रीय सुरक्षाकर्मियों को मदद पहुंचा सकें।

इस बात की अफवाह भी उड़ रही थी कि जर्मन सम्राट नगर में घुसने के बाद नागरिकों पर आक्रमण भी कर सकता है, उसके बाद ही नगर राजशाही के अधीन होगा। यह खबर आग में घी का काम किया। ऐसी अफवाहें लोगों के गुस्से को परवान चढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं। पेरिस के लोग वैसे भी निडर थे, युद्ध उनके लिए कोई नई बात नयी नहीं रह गयी थी। इसलिए प्रशिया सम्राट के सैन्यबल के साथ नगर-प्रवेश के पूर्व ही उसके विरोध की तैयारियां पूर्ण रूप से हो चुकी थीं। नागरिक सेना के विद्रोह को जनसाधारण के समर्थन का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि सेना का सशस्त्र विरोध करने के लिए आवश्यक तोपों और हथियारों की खरीद के लिए पेरिस के सामान्य नागरिकों ने भी बढ़ चढ़ कर चंदा दिया था। जर्मन सम्राट के प्रवेश से पहले ही तोपें उपयुक्त स्थान पर अच्छी तरह से तैनात कर दी गई थीं। उनके संचालन के लिए नागरिक सैनिक तैयार किए जा रहे थे। ऊंचाई पर स्थित मोंटमेंट्री नामक स्थान को विद्रोह के प्रमुख ठिकाने के रूप में चुना गया था। वह सामरिक दृष्टि से भी अनुकूल था, उसके चारों ओर मजदूर बस्तियां थीं, निवासियों में से अधिकांश नागरिक सेना के प्रति समर्पित थे। सारी तैयारी इतनी गुपचुप और भरोसेमंद थी कि भारी-भरकम सैन्यबल के साथ नगर-प्रवेश की तैयारी कर रहे जर्मन-सम्राट को इसकी खबर तक न लगी थी। प्रशिया की जंगी सेना के मुकाबले साधनविहीन, लगभग हार के मुहाने पर खड़े पेरिस- वासियों के मन में अपनी अस्मिता, मान-सम्मान और आजादी के प्रति इतना गहरा अनुराग था कि लोग नागरिक सेना में भर्ती होने उमड़े आ रहे थे। उनमें स्त्री-पुरुष, बूढ़े और बच्चे हर वर्ग के लोग थे, जो स्वेच्छा से मर-मिटने को तैयार थे। हर कोई अपना राज चाहता था तथा उसके लिए यथासंभव बलिदान देने को उत्सुक थे, लोगों का मानना था कि मरना तो वैसे भी है तो लड़ कर मरें। जीत गए तो अपनी शासन-सत्ता।

एडोल्फ थीयर को इस बात का अंदाजा हो गया था कि राजनीतिक अस्थिरता और उथल-पुथल का लाभ उठाकर नागरिक सुरक्षादल ने वैकल्पिक शक्तिकेंद्र बना लिए हैं। आमजनता का उन्हें संरक्षण भी प्राप्त हो गया है। उसकी मुख्य चिंता थी कि हथियारबंद नागरिक सुरक्षादल के साथ-साथ अधौगिक मजदूर भी हथियार उठा सकते हैं, जिससे क्रुद्ध होकर जर्मन सेना नगर में तबाही मचा सकती है। इस बीच जर्मन सेना दो दिन के लिए पेरिस में आई और चुप-चाप चली भी गई। इसके बावजूद भी पेरिस का वातावरण लगातार गरमाता रहा। जुझारू प्रदर्शन शुरू हो गए और मजदूर वर्ग ने विद्रोह का ऐलान कर दिया — थियर जैसे तथाकथित गणतंत्रवादी और राजशाही समर्थक गद्दारों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई।

इससे पहले प्रशिया के जीत के बाद प्रशिया फ्रांस की जनता के तेवर देखने के बाद फरवरी 1871 में जनमत के दबाव में उसे मजबूरन गणतंत्र और अंतरिम राष्ट्रीय सुरक्षा की की सरकार की घोषणा करनी ही पड़ी। इस सरकार के प्रमुख पदों पर पूंजीवाद समर्थक गणतंत्रवादी थे। मार्क्स फ्रांस का गृहयुद्ध में लिखते हैं- “जब पेरिस के मजदूरों ने गणतंत्र की घोषणा की तो तुरंत ही पूरे फ्रांस में ऐसी निर्विरोध घोषणाएं हुईं। मौके की ताक में बैठे कुछ बैरिस्टर होटल द विल्ले (संसद) पर काबिज हो गए, थियर उनका नेता था और थ्रोचू जनरल……….. हड़पी हुई अपनी सत्ता की वैधता के लिए पेरिस के प्रतिनिधित्व का अप्रासंगिक हो चुका जनादेश ही काफी समझा”।

मार्क्स ने उपरोक्त लेख में सरकार के मंत्रियों के वक्तव्यों के हवाले से बताया है कि सरकार तो समझौता करना चाहती थी लेकिन लोगों और नेशनल गार्ड की देशभक्ति के बुलंद जज्बे को देखते हुए, हिम्मत न कर सकी उल्टे शगूफा छोड़ दिया, “न तो एक इंच जमीन छोड़ेंगे, न ही जर्मनों को किले की एक ईंट ले जाने देंगे”, और जर्मन सेना ने पेरिस पर घेरा डाल दिया।

उधर नगर के अशांत वातावरण से बचने के लिए नवनिर्वाचित राष्ट्रीय असेंबली ने बार्डोक्स के बजाय, उससे मीलों दूर पेरिस के दक्षिण-पश्चिम में स्थित वर्सेलाइस को अपना सम्मेलन-स्थल बनाने का निर्णय किया। सम्मेलन के लिए अधिकांश नेताओं के पेरिस से प्रथान कर जाने से वहां राजनीतिक शून्य पैदा हो गया। नेशनल असेंबली के सदस्यों में से अधिकांश राजशाही और साम्राज्यवाद के के समर्थक थे। दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन में लोकतंत्र समर्थकों का वर्चस्व था। असेंबली के सदस्यों के वर्सेलाइस प्रस्थान करते ही स्थानीय प्रशासन पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई। दूसरी ओर नागरिक सुरक्षादल की केंद्रीय समिति में सुधारवादियों का अनुपात और उनका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था। हालात का अनुमान लगाते हुए सरकार ने निर्णय लिया कि सेना की चार सौ तोपों को नागरिक सुरक्षादलों के अधिकार में रखना सामरिक दृष्टि से उचित नहीं है। अत: 18 मार्च को जनरल थीयर ने सेना को आदेश दिया कि वह मोंटमेंट्री की पहाड़ियों तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर तैनात तोपखाने को अपने अधिकार में कर ले, मगर कुछ ही दिन पहले प्रशिया सेना से भारी पराजय झेल चुके सैनिकों का मनोबल बहुत गिरा हुआ था और थके हुवे भी थे। अपने ही लोगों का सामना करने का उनमें साहस नही था। जिससे उनकी सेना में भी फूट पड़ चुकी थी। ज्यादातर सिपाही प्रशिया से अन्दर-अन्दर खार खाए बैठे थे। कई सैनिक नेशनल गार्ड्स(नागरिक सुरक्षादल) को गले लगा रहे थे। क्या अद्भुत दृश्य रहा होगा। तोपखाने को अपने कब्जे में लेने के लिए वह टुकड़ी जैसे ही मोंटमेंट्री पहुंची, स्थानीय नागरिक और सुरक्षाकर्मी भड़क गए। क्लाउड मार्टिन लेकाम्टे सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था, उसने अदूरदर्शिता और नासमझी का प्रदर्शन करते हुए सुरक्षाबलों और स्थानीय जनता पर गोलीबारी का आदेश सुना दिया, जिससे लोग भड़क गए। भीड़ ने लेकाम्टे तथा जनरल थाॅमस को उनके घोड़ों से खींच लिया, उत्तेजित नागरिक सैनिकों ने दोनों को वहीं गोली से उड़ा दिया। बुजुर्ग जनरल था॓मस कभी नागरिक सुरक्षादल का कमांडर होता था, मगर अवसरवादी रुख अपनाते हुए वह राजशाही के पक्ष में चला गया था। उत्तेजित भीड़ ने उसको भी वहीं दबोच लिया। थॉमस ने 1848 की क्रांति में मजदूरों पर गोली चलवाई थी।

नेशनल गार्ड क्रांति के अग्रदूत बन गए। 215 बटालियनों के प्रतिनिधियों ने नेशनल गार्डों के महासंघ की केंद्रीय कमेटी का चुनाव हुआ। केंद्रीय कमेटी की सत्ता तुरंत सर्वमान्य हो गयी और थियर सरकार द्वारा नियुक्त कमांडर को इस्तीफा देना पड़ा। विद्रोहियों का रुख देखकर बाकी बची सेना भी उनके साथ मिल गई। जनरल थीयर ने पेरिस को खाली कराने का आदेश दिया। तब तक विद्रोही पूरे शहर में फैल चुके थे। स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में उनका साथ दे रहे थे, सेना का कहीं अता-पता न था। उधर एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करना हुआ जनरल थीयर वर्सेलाइस के लिए निकल गया। इससे लोगों को लगा कि वह घबराकर भागा है, जिससे नागरिक सेना का मनोबल और भी बढ़ गया। जनरल थीयर ने बाद में दावा किया था कि पेरिस से हटना उसकी एक रणनीतिक चाल थी।

पेरिस के चप्पे-चप्पे पर नागरिक सुरक्षाकर्मी छाए हुए थे। शासक के रूप में मात्र नागरिक सुरक्षादल तथा उनकी केंद्रीय समिति थी। एडोल्फ थीयर भी जा चुका था पुरी तरह से सत्ता अब मजदूरों के हाथ में आ चुकी थी। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मजदूरों ने गणतांत्रिक पद्धति के अनुरूप शासन चलाने का निर्णय लिया। नगर पूरी तरह से नागरिक सेना के अधिकार में था। क्रांति की सफलता और सुनिश्चितता के लिए जनजीवन को पटरी पर लाना अत्यावश्यक था। जिसके लिए केंद्रीय परिषद ने जनसुविधाओं की बहाली और प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए कई कदम उठाए, जिसके कारण पेरिसवासियों को आजादी का एहसास हुआ। मगर युद्ध के बाद अस्त-व्यस्त हो चुके जनजीवन को सहेजने के लिए बड़े पैमाने पर नागरिक सुविधाओं की जरूरत थी। कम्यून ने घोषित किया कि उसका उद्देश्य समाजवादी आदर्श का प्रसार और “पूंजीपतियों के फायदे के लिए मजदूरों का आपसी अराजक प्रतिस्पर्धा का अंत करना है”। जिसके लिए सेना तथा पुलिस को अवैधानिक करार कर, भंग कर दिया गया। चर्च को राज्य से अलग कर धर्म को निजी मामला घोषित किया गया। चर्च को राज्य से अलग करने का परिणाम यह हुआ कि उसकी समस्त परिसंपत्तियां जनता के स्वामित्व में आ गईं। कुछ चर्चों को महिलाओं के क्लब में तब्दील कर दिया गया जहां वे अपनी समस्याओं पर विचार-विमर्श की बात किया करते थे। महिलाओं ने हर कदम पर पेरिस कम्यून में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका अदा की थी। बाल श्रम को और रात्रि पाली में बेकरियों में कार्य प्रतिबंधित कर दिया गया। राज्य के सबसे ऊंचे कर्मचारी और मजूदरों के तनख्वाह छह हजार फ्रैंक से अधिक नहीं होना तय किया गया। अफसरों के सभी विशेषाधिकारों को खत्म कर दिया गया। अफसर, मजिस्ट्रेट, जज ये सभी जनता द्वारा चुने जाते। मृत्युदंड को समाप्त कर दिया गया। अमीरों के खाली घरों व सार्वजनिक भवनों में बेघरों के लिए व्यवस्था की गयी। नौकरशाही और विधायिका के फर्क को मिटा दिया गया। अब जो कानून बनाएगा उसी पर उसे लागू करने की भी जिम्मेदारी थी। पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए मजदूरों के मध्य घातक प्रतियोगिता पर रोक लगा दी गयी। आर्ट गैलिरियां आम लोगों के लिए खोल दी गयी।

प्रशासनिक अधिकारी, आम मजदूर के समान वेतन पर काम करने वाले कम्यून द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि थे, जिन्हें वापस बुलाया गया। पाठशालों में धार्मिक गतिविधियों का आयोजन तत्काल प्रभाव से बंद करा दिया गया। बेघरों के लिए सार्वजनिक भवनों में जगह दी गयी और भगोड़ों के घर जब्त किए गए। शिक्षा, प्रेक्षागृह और ज्ञान तथा संस्कृति के सारे केंद्र सार्वजनिक रूप से सभी को सुलभ करा दिए गये। विदेशी कामगरों को तुरंत ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूरों के सार्वभौमिक गणतंत्र’ के सदस्य के रूप में मान्यता दी गयी। जितने समय तक नगर का कामकाज ठप्प रहा था, उस अवधि का किराया पूरी तरह माफ माफ किए गए। पेरिस स्थित सैकड़ों बेकरियों में रात की ड्यूटी करने पर पाबंदी लगा दी गयी जिसमें बड़ी संख्या में स्त्री और बच्चे काम करते थे। अविवाहित जोड़ों तथा ड्यूटी के दौरान मारे गए नागरिक सैनिकों के लिए पेंशन की व्यवस्था की गयी। युद्धकाल में श्रमिकों द्वारा गिरवी रखे गए औजारों और घर के साज-सामान की बिना किसी अदायगी के वापसी की गयी। क्योंकि कम्यून का विचार था कि अधिकांश दक्ष कारीगरों को युद्धकाल अपने औजार गिरवी रखने के लिए विवश किया गया था। व्यापारिक उद्देश्यों के लिए गए ऋण पर भुगतान को स्थगित किया तथा सभी प्रकार के ऋणों पर देय ब्याज से मुक्ति भी दिया। कारखाना मालिकों द्वारा छोड़े गए तथा निष्क्रय पड़े कारखानों को श्रमिकों को चलाने का अधिकार भी दिया और पूर्व कारखाना मालिकों को क्षतिपूर्ति के रूप में समुचित भत्ता मांगने का अधिकार भी दिया गया।

पेरिस में राहजनी और चोरी-डकैती बंद हो गयी थी,पेरिस की वेश्याएं गायब हो गयी थी। 1848 के बाद पहली बार पेरिस की सड़कें निरापद थी। इसके अलावा पेरिस कम्यून सही मायनों में एक अंर्तराष्ट्रीयतावादी सरकार थी जहां राष्ट्रीयता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। पेरिस कम्यून में कई देशों के प्रतिनिधि सरकार के उॅंचे पदों पर थे। दुनिया भर के क्रांतिकारी इटली, जर्मनी, पालैंड के क्रांतिकारी पेरिस कम्यून के संचालन में शामिल थे। विदेशी मजदूरों व क्रांतिकारियों को जिसे पेरिस कम्यून ‘यूनिवर्सल रिपब्लिक’ कहा करते, उसकी स्थापना के संघर्ष का सहयोगी के रूप में मानते थे।

मार्क्स ने कम्यून के दो सबसे महत्वपूर्ण कदमों की सराहना करते हुए कहा लिखा "पुरानी सरकार के भौतिक ताकत के तत्वों, सेना तथा पुलिस को खत्म करने के बाद पेरिस कम्यून ने उनकी आध्यामिक ताकत यानी चर्च और पादरियों की ताकत का विघटन कर दिया। पादरियों को उनकी निजी जिंदगी जीने के लिए ठीक उसी तरह कहा गया जैसे पूर्व के समय मे करते थे यानी भिक्षाटन द्वारा जीविका चलाते थे।" मार्क्स ने कम्यून के संबन्ध में यह भी टिप्पणी भी द्रष्टव्य है" कम्यून ने बर्जुआ क्रांतिकारियों के दो नारों - सस्ती सरकार- को यथार्थ में तब्दील कर दिया। यह कार्य उन्होंने दो सबके खर्चीले स्रोत सेना और कर्मचारियों को नष्ट कर पूरा कर दिया।"

पेरिस कम्यून मजदूरों की शोषण, उत्पीड़न से रहित समाज बनाने के अनूठे प्रयास की सबसे खास बात यह थी कि सब चीजों के संचालन में आम लोगों की बड़े पैमाने पर भागीदारी होती। लेनिन ने जब अपनी मशहूर अप्रैल थीसिस लिखी उसमें समाजवादी समाज का खाका स्पष्ट करते हुए उसके फुटनोट में लिखा कि ‘‘ठीक वैसा ही राज्य जैसा कि अपने भ्रूण रूप में पेरिस कम्यून में था।’’

समाजवादी विचारक लुईस अगस्त ब्लेंकी प्रशासन और नागरिक सेना की बागडोर संभालेंगे तथा बदले हुए वातावरण में सबसे प्रभावी क्रांतिनेता सिद्ध होंगे। मगर का दुर्भाग्य रहा कि 17 मार्च के दिन ब्लेंकी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। जीवन के बाकी दिन उसको जेल ही में बिताने पड़े। एक सौदे के रूप में कम्यून के नेताओं ने ब्लेंकी के प्रत्यार्पण के बदले पेरिस के पुजारी डारबी तथा 74 अन्य युद्धबंदियों को छोड़ देने का आश्वासन दिया, मगर थीयर ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। तो भी नागरिक सुरक्षाबलों तथा आंदोलनकर्मियों के अनुशासन में 28 मार्च को पेरिस कम्यून में ढल गया। वर्गहीन-राज्यविहीन समाज गढ़ने की कोशिश में सभी स्थानीय निकायों को भंग कर दिया। अनुभव की कमी के बावजूद समाजवादी आंदोलन के इतिहास में पेरिस कम्यून को मिली कामयाबी अद्वितीय और चामत्कारिक थी।

इस परिघटना में केंद्रीय कमेटी की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन परिस्थिति ने उसे सरकार की स्थिति में बैठा दिया। थियर और उसके मंत्रियों की हालत खराब हो गयी। सैनिक हुक्म मानने की बजाय सोचने लगे कि विद्रोह कर दें। यह बात उन्होंने सपने भी नहीं सोची थी। भयभीत हो आनन-फानन में पेरिस से वरसाय भाग गया और सेना तथा प्रशासनिक कर्मियों को शहर खाली कर देने का हुक्म दे दिया। थियर का पीछा कर उसकी बची-खुची सेना को भी नष्ट करने के प्रस्ताव को केंद्रीय कमेटी ने नहीं माना। बाद में देखने पर लगता है कि यह एक ऐतिहासिक गलती थी।

दरअसल केंद्रीय कमेटी ज्यादातर सदस्यों में सैद्धांतिक परिपक्वता का अभाव था और वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका लिए तैयार नहीं थे। पेरिस में अब नेशनल गार्ड सरकार की स्थिति में था तथा केंद्रीय कमेटी ने सारे सामरिक स्थानों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। मजदूरों के निहत्था करने की सरकार की नाकाम कोशिश के बाद पेरिस के मजदूरों और वारसाय में छिपी सरकार के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी घोषणापत्र में कहा गया, “शासक वर्गों की नाकामियों और गद्दारियों को देखते हुए, पेरिस का सर्वहारा समझ गया है कि वक्त आ गया है कि सार्वजनिक मसलों को संचालन वह अपने हाथ में ले ले….

मार्क्स ने एटींथ ब्रुमेयर में लिखा था कि पूर्ववर्ती क्रांतियों ने राज्य-मशीनरी को नष्ट करने की बजाय उन्हें मजबूत किया और फ्रांस में गृहयुद्ध में लिखते हैं, “मजदूर वर्ग पहले से ही मौजूद राज्य मशीनरी पर मात्र कब्जा करके उसे अपने वर्गीय हितों के लिये प्रयोग नहीं कर सकता। चूँकि उसकी राजनैतिक गुलामी का हथियार कभी उसकी मुक्ति का यंत्र नहीं बन सकता”।

इस कम्यून के निर्वाचित सदस्यों में भी कई प्रवासी भी थे। सामाजिक जीवन के तमाम पहलुओं को ‘साझे हित’ में व्यवस्थित करने के लिए दिन-रात हजारों लोगों की सभाएं लिए होने लगीं। कम्यून और नेशनल गार्ड की छत्रछाया में विकसित हो रही व्यवस्था का चरित्र निस्संदेह समाजवादी था। कम्यून की भयानकतम गलतियों में वार्साय की जवाबी हमलों को नजर अंदाज करना और केंद्रीय बैंक पर कब्जा करने की मार्क्स की सलाह को न मानना था जो थियर को कम्यून को कुचलने की तैयारी के लिए लाखों फ्रैंक मुहैया कराता रहा। लेनिन के नेतृत्व में 1917 में यह गलती बोलशेविकों ने नहीं दुहराया, सबसे पहले उन्होंने बैंक, सेना और प्रसारण संस्थान सहित तमाम संस्थानों को कब्जे में लिया था।

1971 मे जनरल कौंसिल के अपने दो संबोधनों तथा फ्रांस में गृहयुद्ध में मार्क्स ने और भी स्पष्ट किया है। इसीलिए मार्क्सवाद कोई स्थिर विचारधारा नहीं, दुनिया को समझने-बदलने का गतिमान विज्ञान है। 20 साल बाद 1891 में फ्रांस में गृह युद्ध के नए संस्करण की भूमिका में एंगेल्स लिखते हैं, “हाल के दिनों में कई टुटपुंजिया सामाजिक जनतंत्रवादी, सर्वहारा की तानाशाही जैसे शब्दों का हौव्वा खड़ा करने में लगे हैं। ठीक है आप जानना चाहते हैं कि सर्वहारा की तानाशाही कैसी होती है? पेरिस कम्यून देखिए, वह सर्वहारा की तानाशाही थी”।

मार्क्स ने कम्यून को अपने संदेश में स्पष्ट किया था कि पेरिस के बाहर अड्डा जमाये प्रशियन सैनिक या तो थियर की मदद करेंगे या खुद कम्यून पर हमला कर देंगे। मार्क्स यह स्पष्ट समझ रहे थे कि सर्वहारा की इस क्रांति को पुख़्ता करने के लिए ज़रूरी है कि पेरिस के कामगारों की सेना पेरिस में प्रतिक्रान्ति की हर कोशिश को कुचलकर, बिना रुके वर्साय की ओर कूच कर जाना चाहिए था। वर्साय में ही थियेर सरकार के साथ ही पेरिस के सभी धनपशुओं ने शरण ले रखी थी। उस समय थियर की कमान में मात्र 27 हजार हतोत्साहित सैनिक थे और सर्वहारा की फौज में एक लाख नेशनल गार्ड्स।

पेरिस की नकल पर कई और कम्यून बने थे। वार्साय पर झंडा गाड़ने के बाद क्रांति को देशव्यापी बनाया जा सकता था लेकिन किसी ऐतिहासिक मिसाल, सैद्धांतिक परिपक्वता, ठोस संगठित नेतृत्व, ठोस स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव और घेराबंदी की अफरातफरी में, पेरिस का मजदूर जमीनी हकीकतों के संदर्भ में, सर्वहारा के हित में नये समाज के गठन की प्रक्रिया में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा था। इसीलिए लगता है, कम्यून क्रांति को पुख्ता किए बिना क्रांति के बाद के समाज के ताने-बाने में फंस गया। छोटी मोटी झड़पों में वारसाय सेना द्वारा कुछ कम्युनार्डों को पकड़कर कत्ल कर देने की घटना के बाद, नेशनल गार्ड के दबाव में कम्यून ने वरसाय पर 3 मोर्चों से हमला करने का फैसला लिया। अपनी सामरिक कमजोरी को जानते हुए, थियर कम्यून से वर्तालाप का नाटक कर रहा था, और जैसा कि मार्क्स को पूर्वाभास था, कम्यून को कुचलने के लिए बिस्मार्क से गुप-चुप सौदे बाजी। और अंततः जब पुनर्गठित सेना के साथ पेरिस पर भारी तोपों के साथ हमला बोला तो राजनैतिक और सामरिक अनुभव और अंतर्दृष्टि की कमी के चलते, सर्वहारा की फौज को लड़ते हुए पीछे हटना पड़ा और एक सप्ताह तक पेरिस पर बमबारी होती रही, इसे इतिहास में काला सप्ताह नाम से याद किया जाता है।

नागरिक संगठन एक ओर सामूहिक जीवन को समृद्ध बनाने के लिए निरंतर नए प्रयास कर रहे थे, प्रशिया ने अपने सैनिकों और फ्रांस के सैनिकों की मदद से पूरे पेरिस की घेराबंदी कर दी जिससे 21 मई को थीयर के नेतृत्व में संयुक्त सेना ने पश्चिमी दरवाजे से नगर पर हमला बोल दिया। नागरिक सुरक्षाकर्मियों ने आम जनता की मदद से उन्हें रोकने का प्रयास किया। जिससे प्रशिया के सैनिकों ने कत्लेआम मचा दिया, पेरिस के चप्पे-चप्पे पर नागरिकों और सैनिकों के बीच घमासान युद्ध छिड़ा था। लोग राजशाही के अधीन रहने के बजाय स्वाधीन रहते हुए जान देना ठीक समझते थे। नगर के पूर्वी सिरे पर मजदूर बस्तियां थी, कम्यून की जीवनशैली में उन्हें सम्मानजनक अवसर मिले थे। इसलिए प्रशिया और जनरल थीयर के सैनिकों का सर्वाधिक विरोध भी उसी ओर था। गरीब मजदूर जी-जान से संघर्ष कर रहे थे, मगर हथियारों की कमी और युद्धनीति की जानकारी का अभाव उनकी सफलता के आड़े आया। धीरे-धीरे मजदूर सेना कमजोर पड़ने लगी। 28 मई, 1871 को आखिरकार पेरिस फिर से राजशाही के अधीन चला गया। क्रुद्ध सैनिकों ने खूब कत्लेआम किया। लक्समबर्ग के बागों और लोबाउ छावनी में विशेषरूप से बनाई गई कत्लगाहों में हजारों विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया। करीब 40,000 से अधिक युद्धबंदियों को निष्कासन की सजा सुनाई गई। आम जनता यहां तक कि स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। पेरिस पर पुनः सेना का कब्जा हो जाने के बाद 12,500 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों पर मुकदमा चलाया गया। उनमें से 10,000 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई, 23 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। लगभग 4,000 को न्यू सेल्डोनिया में निर्वासित कर दिया गया। बाकी को कैद की सजा हुई, सेना द्वारा सामूहिक नरसंहार के उस सप्ताह में कुल कितने लोगों को मौत के घाट उतारा गया। बेंडिक्ट एंडरसन के अनुसार उस खूनी सप्ताह के भीतर पकड़े गए लगभग 20,000 सैनिकों में से कुल 7,500 को मौत की सजा सुनाई गई। जबकि कुछ इतिहासकार इस संख्या को 1,00,000 से भी अधिक बताते हैं।

पेरिस कम्यून पर कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित इतिहासकार जाॅन मेरीमेन ने अपनी किताब में वर्साई की सेना द्वारा व्यापक पैमाने पर किए गए कत्लेआम का ब्योरा देते हुए लिखा है ‘‘वर्साई की सेना जब घुसी तब कम्युनार्डों ने उनसे भरसक लड़ने का प्रयास किया। लेकिन अंततः उन सबको पकड़कर, एक साथ लाइन में खड़ाकर, गोली मार दी गयी। उनको या तो दीवार के पीछे खड़ा कर गोली मारी गयी या फिर किसी गहरी खाई के किनारे में खड़ा कर गोली मार दी जाती। गोली लगने के बाद कम्युनार्ड खाई में गिर जाते। महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। दर्जनों महिला कम्युनार्डों को जंजीरों से बांधकर लाया जाता और गोली मार दी जाती। कम्युनार्डों की संख्या इतनी अधिक थी कि मशीनगनों को तीस मिनट तक लगातार चलाते रहना पड़ता था। बंदी बना गए कैदियों को कभी सौ, कभी दौ सौ तो कभी तीन सौ की संख्या में लाकर प्रकार एक साथ मार डाला जाता।"

वैसे तो ‘सिविल वार’ 28 मई समाप्त हो गया था लेकिन मजदूरों की हत्या बदस्तुर जारी रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद 20 हजार लोग और मारे गए। जिस किसी पर भी कम्युनार्डों से संबंध होने का थोड़ा भी शक होता वे सभी कत्ल कर दिए जाते। यदि किसी को चेहरा या वेषभूषा कम्युनार्डों की तरह नजर आता, या उसने किसी पर कम्युनार्डों को शरण देने का आरोप ही हो उन सबको मार डाला जाता। पेरिस के मज़दूरों तो मानो सफाया जैसा कर दिया गया। 1866 से 1872 के मध्य के एक तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है कि 24 हजार जूता बनाने वाले मजदूरों में से आधे से अधिक, तीस हजार दर्जी, बीस हजार में से छह हजार संदूक व आलमीरा बनाने वाले, साढ़े हजार तांबा मजदूरों में से डे़ढ़ हजार मजदूर पेरिस में नहीं थे। यानी इतने लोगों की हत्या कर दी गई। पेरिस कम्यून की समाप्ति के बाद उद्योग जगत और कारीगरी को नौकरी पर रखने वाले लोगों ने कुशल मजदूरों की कमी की शिकायत पायी गयी।

एक जर्मन पत्रिका ने पेरिस कम्यून की दसवीं वर्षगांठ (1881) पर बिल्कुल सही लिखा था "लहू का समुद्र दो दुनियाओं को विभाजित करता था। एक ओर वे लोग थे जिन्होंने एक भिन्न व बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष किया जबकि दूसरी ओर वे थे जो पुरानी दुनिया को बरकार रखना चाहते थे।"

सेना का चरित्र वैतनिक हत्यारों सा होता है, किसी विदेशी सेना का नहीं, अपनी विद्रोही जनता का। इसके बाद प्रतिक्रियावादियों ने सड़कों पर दमन का जो तांडव किया वह बेमिसाल है। पेरिस लाशों से पट गया। लगभग 30 हजार क्रांतिकारियों ने शहादत दी, जिसमें बच्चे-बूढ़े-महिलाएं सब थे। नागरिक सेना लड़ी तो भूतपूर्व बहादुरी से लेकिन सामरिक योजना में अपरिपक्वता के चलते 28 मई को 2 महीने का कम्यून पराजित हो गया। सशस्त्र दस्ते जून में पेरिस की सड़कों पर गस्त करते रहे और किसी को भी कम्यून के सहयोगी के संदेह में गोली मार देते थे। यंहा तक की मजदूरों को ढूंढ-ढूंढ़ कर जिनके हाथ में घट्ठे पड़े हों तो उनको सरे राह काट डाला गया। ताकि फिर कोई मजदूर विद्रोह करने की सोचे भी ना। कम्यून के पतन के बाद सभी देशों में समाजवादी इंटरनेशनल के सदस्यों और शाखाओं पर दमन बढ़ता रहा और संगठन में टकराव, जिसके नतीजतन संगठन दो फाड़ हो गया और अंततः कई टुकडो में बंट गए।

कम्यून की चालीसवीं वर्षगाँठ पर 1921 में रूसी क्रान्ति के नेता लेनिन ने लिखा, “आधुनिक समाज में सर्वहारा, जिसे पूँजी द्वारा आर्थिक रूप से ग़ुलाम बना लिया गया है, तब तक राजनीतिक रूप से शासन नहीं कर सकता जब तक वह उन बेड़ियों को तोड़ न दे जो पूँजी के साथ उसे बाँधती हैं। इसीलिए कम्यून को समाजवादी दिशा पर आगे बढ़ना चाहिए था, यानी उसे पूँजीपति वर्ग के शासन, पूँजी के शासन को उखाड़ फेंकने की कोशिश करनी चाहिए थी और मौजूदा सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद को ही नेस्तनाबूद करने की कोशिश करनी चाहिए थी।” 1917 में जब रूसी मज़दूरों ने महान सोवियत कम्यून की स्थापना की तो उनके पास अधिक अनुकूल वस्तुपरक परिस्थितियों के साथ-साथ उन्हें नेतृत्व देने के लिए सर्वहारा की एक ऐसी सुदृढ़ क्रान्तिकारी पार्टी मौजूद थी, जो पेरिस के मज़दूरों के पास नहीं थी।

जब सितंबर 1871 को अंतिम कम्युनार्ड को पकड़ लिया गया। गोली मारे जाने के ठीक पहले पूर्व जो उसने लिख छोड़ा वह स्वर्णाक्षरो में आज भी अंकित है। ‘‘मैं पेरिस कम्यून से संबंधित हूॅं। लेकिन अब मैं इसके शत्रुओं के हाथों में हूॅं। मैं स्वाधीनता के आदर्शों के साथ जीवित रहा और अब उसी के लिए मरने जा रहा हूँ। प्रतिक्रियावादी लोग मेरा सर कलम करना चाहते हैं। ये काम वे शौक से कर लें। मैं आगे आने वाली पीढि़यों के लिए जीवित रहा हूँ। हमारे संघर्षों की स्मृति उन्हें प्रेरणा देगी।’’

काल मार्क्स ने 18 मार्च के पहले ही कहा था कि तत्कालीन, प्रतिकूल परिस्थियों में सत्ता पर कब्जा करना एक “दुस्साहसिक भूल होगी” लेकिन इतिहास में स्वफूर्तता की अपनी भूमिका होती है। पेरिस के मजदूर महज अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि शोषण, वर्गविभाजन, सैन्यवाद और राष्ट्रोन्माद से मुक्त “एक सार्वभौमिक गणतंत्र” की। 1871 की तुलना में आज गहराते पूंजीवादी संकट के संदर्भ में विकसित और विकासशील औद्योगिक देशों में क्रांति की परिस्थियां ज्यादा अनुकूल हैं, लेकिन पहले इंटरनेशनल जैसे क्रांतिकारी संगठन की नामौजूदगी से शासकवर्ग संकट से विषयांतर के लिए नस्लोन्माद, धर्मोन्माद, राष्ट्रोन्माद का सहारा ले रहा है। आज जरूरत ऐसे समाज की ठोस बुनियाद तैयार करने की है जिसके लिए पेरिस के सर्हारा स्त्री-पुरुषों ने कुर्बानियां दीं। कम्यून, अल्पजीविता के बावजूद एक समाजवादी समाज बनाने का ईमानदार प्रयास था और क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर बन गया तथा भविष्य की क्रांतियों का संदर्भबिंदु। और आज मौजूदा दौर में हमें इस संदर्भबिंदु से सबक लेते हुवे एक ठोस कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करके वर्तमान भौतिक परिस्थियों का ठोस विश्लेषण करते हुवे ठोस कार्यक्रम निर्धारित करते हुवे मौजूदा समस्यायों का के समाधान के लिए संघर्ष के करें।

अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर संघ (पहले इण्टरनेशनल) में अपने ऐतिहासिक ‘सम्बोधन’ के अन्त में मार्क्स के शब्द थे  “मज़दूरों के पेरिस और उसके कम्यून को नये समाज के गौरवपूर्ण अग्रदूत के रूप में हमेशा याद किया जायेगा। इसके शहीदों ने मज़दूर वर्ग के महान हृदय में अपना स्थान बना लिया है। इसका संहार करने वालों को इतिहास ने सदा के लिए मुजरिम के ऐसे कटघरे में बन्द कर दिया है जिससे उनके पुरोहितों की सारी प्रार्थनाएँ भी उन्हें छुड़ाने में नाकाम रहेंगी।”

इस लेख के आखिर में पेरिस कम्यून के संबंध में फ्रांस के मशहूर यथार्थवादी चित्रकार गुस्ताव कोरबेट (दो महीनों के दौरान जिम्मेदार पद पर भी रहे और जिनकी पहलकदमी पर साम्राज्यवादी प्रतीक मानी जाने वाली नेपोलियन की मूर्ति को ढाह दिया गया था) की यह टिप्पणी- ‘‘पेरिस सही मायनों में स्वर्ग में तब्दील हो गया है। कोई पुलिस नहीं, कोई बेहूदगी नहीं, किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं। चाहे कुछ भी हो जाए पेरिस में सबकुछ घड़ी के अनुसार कार्य चलता रहता है। काश यह सब कुछ हमेशा ऐसे ही चलता रहता। पेरिस एक स्वप्न की तरह लगता है।’’

*अजय असुर*
*राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा*

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